भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code, IPC) की धारा 498A अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, BNS) की धारा 85 है। यह उस पति या उसके रिश्तेदार को दंडित करती है जो किसी विवाहित महिला के साथ क्रूरता करता है, और इसकी सज़ा तीन साल तक की कैद और जुर्माना है। क्रूरता का अर्थ धारा 86 में परिभाषित है। यह अपराध गैर-ज़मानती (non-bailable) और अशमनीय (non-compoundable) है, और संज्ञेय (cognizable) तब है जब सूचना स्वयं महिला, उसके किसी रिश्तेदार, या अधिसूचित लोक सेवक से आए।
| वर्तमान प्रावधान | धारा 85, भारतीय न्याय संहिता, 2023 |
| पहले का प्रावधान | धारा 498A, भारतीय दंड संहिता, 1860 |
| क्रूरता की परिभाषा | धारा 86, BNS (पहले 498A का स्पष्टीकरण) |
| किस पर आरोप लग सकता है | पति, या पति का कोई रिश्तेदार |
| सज़ा | 3 साल तक की कैद, और जुर्माना |
| संज्ञेय | हाँ, जब सूचना महिला, रक्त, विवाह या दत्तक-ग्रहण से संबंधित किसी रिश्तेदार, या अधिसूचित लोक सेवक द्वारा दी जाए |
| ज़मानती | नहीं |
| शमनीय | नहीं — पक्षकार इसे अधिकार के तौर पर आपस में नहीं निपटा सकते |
| विचारण (ट्रायल) कौन करेगा | प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट (Magistrate of the first class) |
| संबंधित प्रावधान | दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 (Dowry Prohibition Act, 1961); घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) |
नया नंबर, और दोनों धाराओं का हवाला अब भी क्यों मायने रखता है
भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने भारतीय दंड संहिता की जगह ली है। इस बदलाव में धारा 498A धारा 85 बन गई, और क्रूरता को परिभाषित करने वाला स्पष्टीकरण एक अलग प्रावधान, धारा 86, बन गया।
प्रावधान का सार दोबारा लिखा नहीं गया, बल्कि ज्यों-का-त्यों आगे लाया गया। इसका एक व्यावहारिक परिणाम समझने लायक है: 498A के तहत तय हुए फैसलों का बड़ा भंडार — क्रूरता किसे माना जाए, रिश्तेदार कौन है, कार्यवाही कब रद्द की जानी चाहिए — नए प्रावधान के लिए भी नज़ीर बना रहता है। 498A का हवाला देने वाला 2010 का कोई फैसला पुराना नहीं पड़ा है।
| विषय | पुराना (IPC) | नया (BNS) |
|---|---|---|
| पति या रिश्तेदार द्वारा क्रूरता | धारा 498A | धारा 85 |
| क्रूरता की परिभाषा | 498A का स्पष्टीकरण | धारा 86 |
| दहेज मृत्यु | धारा 304B | धारा 80 |
यह कथित अपराध की तारीख से तय होता है। 1 जुलाई 2024, जब नई संहिता लागू हुई, उससे पहले के आचरण पर मुकदमा IPC के प्रावधान के तहत चलता है; उसके बाद के आचरण पर BNS के प्रावधान के तहत। जहाँ आचरण का सिलसिला इस बदलाव के आर-पार फैला हो, वहाँ अनुमान लगाने के बजाय इस बिंदु पर सलाह लेनी चाहिए।
कानून क्रूरता किसे मानता है
इस प्रयोजन के लिए क्रूरता परिभाषित है, और इस परिभाषा के दो हिस्से हैं:
- ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण जो महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की संभावना रखता हो, या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य को — चाहे मानसिक हो या शारीरिक — गंभीर चोट या खतरा पहुँचाए। मानसिक स्वास्थ्य को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना महत्वपूर्ण है: लगातार अपमान, कैद में रखना या चीज़ों से वंचित रखना, बिना किसी शारीरिक कृत्य के भी, इसके दायरे में आ सकता है।
- उसे या उससे संबंधित किसी व्यक्ति को संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की किसी अवैध माँग को पूरा करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से उत्पीड़न, या इस कारण उत्पीड़न कि वह या उससे संबंधित कोई व्यक्ति ऐसी माँग पूरी नहीं कर पाया।
दूसरा हिस्सा दहेज से जुड़ा हिस्सा है, और इसी का सबसे अधिक सहारा लिया जाता है। पहला हिस्सा अधिक व्यापक है और इसमें किसी माँग को दिखाना ज़रूरी ही नहीं है।
यह परिभाषा सामान्य वैवाहिक कलह को शामिल नहीं करती। अदालतों ने लगातार एक कठिन विवाह और इस सीमा तक पहुँचने वाले आचरण के बीच अंतर किया है, और यह अंतर विशिष्ट आरोपों और साक्ष्य के आधार पर किया जाता है, इस तथ्य के आधार पर नहीं कि विवाह टूट गया।
मामला कैसे आगे बढ़ता है
- शिकायत और FIR शिकायत पुलिस थाने में या महिला अपराध प्रकोष्ठ (Crime Against Women Cell) में की जाती है, जो कई राज्यों में संपर्क का पहला स्थान होता है। क्योंकि अधिकतम सज़ा तीन साल है, पुलिस FIR दर्ज करने से पहले किसी वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति से चौदह दिन तक की प्रारंभिक जाँच कर सकती है (धारा 173(3) BNSS)।
- गिरफ़्तारी से पहले के प्रारंभिक कदम सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को कानूनी आधारों पर यह आकलन करना होता है कि गिरफ़्तारी ज़रूरी है या नहीं, और अपने कारण दर्ज करने होते हैं। जहाँ गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं है, वहाँ हाज़िर होने का नोटिस जारी किया जाता है। अभियुक्त को उस नोटिस का पालन करना होता है।
- अग्रिम ज़मानत या नियमित ज़मानत क्योंकि अपराध गैर-ज़मानती है, ज़मानत देना अदालत के विवेक पर है। गिरफ़्तारी से पहले अक्सर अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) के लिए आवेदन किया जाता है। अदालतें हर अभियुक्त की विशिष्ट भूमिका पर ध्यान देती हैं, खासकर जहाँ परिवार के कई सदस्यों के नाम हों।
- जाँच और आरोप-पत्र बयान दर्ज किए जाते हैं, दस्तावेज़ और संदेश-संवाद इकट्ठा किए जाते हैं, और जाँच मजिस्ट्रेट के सामने दाखिल आरोप-पत्र (charge sheet) या क्लोज़र रिपोर्ट (closure report) के साथ समाप्त होती है।
- आरोपमुक्ति, आरोप तय होना, और विचारण जिस अभियुक्त के विरुद्ध कोई विशिष्ट आरोप नहीं है, वह आरोपमुक्ति (discharge) के लिए आवेदन कर सकता है। जहाँ आरोप तय होते हैं, वहाँ मामला प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के सामने विचारण (ट्रायल) के लिए जाता है।
- विवाद सुलझ जाने पर कार्यवाही रद्द करवाना जहाँ पक्षकार वास्तव में समझौता कर लेते हैं, वहाँ कार्यवाही रद्द (quash) करवाने के लिए हाईकोर्ट (High Court) में याचिका मान्य रास्ता है, क्योंकि यह अपराध अधिकार के तौर पर शमन नहीं किया जा सकता।
शिकायत कहाँ और कितने समय के भीतर दर्ज हो सकती है
दो प्रश्न तय करते हैं कि कोई शिकायत आगे बढ़ भी पाएगी या नहीं: किस अदालत को क्षेत्राधिकार है, और क्या वह समय-सीमा के भीतर है।
क्षेत्राधिकार
सामान्यतः किसी आपराधिक मामले का विचारण वहीं होता है जहाँ अपराध हुआ। इस प्रावधान के तहत क्रूरता अक्सर किसी एक कृत्य के बजाय लगातार चलने वाला आचरण होती है, और यह ससुराल, पत्नी के मायके और एक से अधिक शहरों तक फैली हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने माना है (Rupali Devi v. State of Uttar Pradesh, 2019) कि जहाँ पत्नी को ससुराल छोड़ने पर मजबूर किया गया हो और उसने अपने मायके में उस क्रूरता के परिणाम भुगते हों, वहाँ की अदालत को क्षेत्राधिकार हो सकता है। सटीक स्थिति दलीलों में बताए गए तथ्यों पर निर्भर करती है, और इस बिंदु पर शुरुआत में ही अक्सर विवाद होता है।
परिसीमा (समय-सीमा)
क्योंकि अधिकतम सज़ा तीन साल है, अदालत सामान्यतः अपराध के तीन साल बाद संज्ञान नहीं ले सकती (धारा 514 BNSS, पहले धारा 468 CrPC)। जहाँ क्रूरता लगातार जारी रही हो, वहाँ समय क्रूरता के अंतिम कृत्य से गिना जाता है, इसीलिए वर्षों तक फैले आचरण के बारे में शिकायत अपने आप समय-बाधित नहीं हो जाती। न्याय के हित में संज्ञान लेने में हुई देरी को माफ़ करने का अधिकार भी अदालतों के पास है।
हाँ। इस प्रावधान में सात साल का कोई नियम नहीं है। सात साल की अवधि दहेज मृत्यु के प्रावधान — धारा 80 BNS, पहले 304B IPC — से जुड़ी है, जो विवाह के सात साल के भीतर अप्राकृतिक परिस्थितियों में महिला की मृत्यु से संबंधित है। दोनों को अक्सर एक-दूसरे से भ्रमित किया जाता है। इस धारा के तहत क्रूरता विवाह की किसी अवधि से सीमित नहीं है। (जहाँ कोई विवाहित महिला आत्महत्या करती है और क्रूरता का आरोप है — आत्महत्या का दुष्प्रेरण — वहाँ सात साल की एक अलग उपधारणा लागू होती है, लेकिन वह भी एक अलग प्रावधान है।)
और तलाक के बाद?
तलाक की डिक्री (decree) अपने आप में विवाह के दौरान हुई क्रूरता की आपराधिक शिकायत को समाप्त नहीं करती। अपराध उसी समय पूरा हो जाता है जब वह किया जाता है। तलाक का असर अक्सर मामले के व्यावहारिक रास्ते पर पड़ता है, क्योंकि वैवाहिक कार्यवाही में हुआ समझौता आमतौर पर बाद में कार्यवाही रद्द करवाने की याचिका का आधार बनता है।
किसी का नाम आने पर क्या होता है, क्रमवार
यह खंड प्रक्रिया बताता है। यह रणनीति की मार्गदर्शिका नहीं है, और यहाँ लिखी कोई बात उस वकील की जगह नहीं ले सकती जिसने शिकायत पढ़ी हो।
- हाज़िर होने का नोटिस, या गिरफ़्तारी सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में Arnesh Kumar मामले के निर्देशों के अनुसार पुलिस को कानूनी आधारों पर आकलन करना होता है कि गिरफ़्तारी ज़रूरी है या नहीं, और अपने कारण दर्ज करने होते हैं। सामान्य पहला कदम हाज़िर होने के लिए नोटिस होता है। उस नोटिस का पालन करना ज़रूरी है — पालन न करना अपने आप में गिरफ़्तारी का आधार है।
- गिरफ़्तारी की आशंका हो तो अग्रिम ज़मानत आवेदन सत्र न्यायालय (Sessions Court) या हाईकोर्ट में किया जा सकता है। अदालतें हर आवेदक की विशिष्ट भूमिका को बारीकी से देखती हैं, इसीलिए किसी दूर के रिश्तेदार का आवेदन, जिसके विरुद्ध कोई विशिष्ट आरोप नहीं है, पति के आवेदन से अलग स्थिति में होता है।
- जाँच बयान दर्ज किए जाते हैं, दस्तावेज़ और संदेश-संवाद इकट्ठा किए जाते हैं, और थाना अपनी राय बनाता है। सुप्रीम कोर्ट के 2025 के निर्देश (नीचे सुरक्षा उपाय देखें) के बाद मामला पहले दो महीने की अवधि के दौरान परिवार कल्याण समिति (Family Welfare Committee) के पास जा सकता है, जिसमें कोई गिरफ़्तारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाती।
- आरोप-पत्र, या क्लोज़र रिपोर्ट जाँच इन दोनों में से किसी एक के साथ समाप्त होती है, जो मजिस्ट्रेट के सामने दाखिल की जाती है। क्लोज़र रिपोर्ट से मामला अपने आप समाप्त नहीं होता — शिकायतकर्ता नोटिस पाने की हकदार है और प्रोटेस्ट पिटीशन (protest petition) दाखिल कर सकती है।
- आरोपमुक्ति आरोप तय होने से पहले, जिस अभियुक्त के विरुद्ध सामग्री से कोई विशिष्ट आरोप नहीं बनता, वह आरोपमुक्ति के लिए आवेदन कर सकता है — मामले के दस्तावेज़ मिलने के साठ दिन के भीतर (धारा 262 BNSS)। यही वह चरण है जिस पर बिना ब्योरे के नामित परिवार के सदस्य सबसे अधिक मामले से मुक्त होते हैं।
- आरोप तय होना और विचारण जहाँ आरोप तय होते हैं, वहाँ मामले का विचारण प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट करते हैं।
- वास्तविक समझौता होने पर कार्यवाही रद्द करवाना हाईकोर्ट में उसकी अंतर्निहित शक्तियों के तहत याचिका। अदालतों ने बार-बार माना है कि सुलझ चुके वैवाहिक विवाद इसके लिए उपयुक्त श्रेणी हैं, भले ही अपराध अशमनीय हो।
लंबित मामले वाला व्यक्ति यात्रा कर सकता है या नहीं, यह इस पर निर्भर करता है कि कोई अदालती आदेश या लुक-आउट सर्कुलर (look-out circular) इस पर रोक लगाता है या नहीं, और दी गई किसी ज़मानत के साथ क्या शर्तें जुड़ी हैं। केवल मामला दर्ज होने से कोई सामान्य स्वचालित रोक नहीं लगती। भरोसेमंद उत्तर केवल उस विशेष मामले के ज़मानत आदेश और अदालती रिकॉर्ड को पढ़कर ही मिलता है — किसी भी वेबसाइट के, इस वेबसाइट समेत, सामान्य नियम पर भरोसा न करें।
अदालत में मामला किन बातों पर टिकता है
दोनों पक्षों के मामले एक ही तरह की सामग्री से बनते हैं, और यह समझना कि किस तरह की सामग्री का वज़न होता है, उपयोगी है — व्यक्ति चाहे किसी भी पक्ष में हो।
| आरोपों की विशिष्टता | किसी नामित व्यक्ति पर लगाए गए तारीखें, घटनाएँ और कृत्य — न कि किसी समूह के विरुद्ध सामान्य दावे |
| उसी समय का रिकॉर्ड | उसी समय की गई शिकायतें, मेडिकल रिकॉर्ड, संदेश और ईमेल, न कि बाद में तैयार किए गए |
| चिकित्सीय साक्ष्य | जहाँ शारीरिक क्रूरता या स्वास्थ्य को चोट का आरोप हो |
| संदेश-संवाद | संदेश और कॉल रिकॉर्ड, जो दोनों पक्षों के काम आ सकते हैं और अक्सर फाइल की सबसे महत्वपूर्ण सामग्री होते हैं |
| स्वतंत्र गवाह | पड़ोसी, सहकर्मी, या दोनों परिवारों से बाहर का कोई भी व्यक्ति |
| वित्तीय रिकॉर्ड | जहाँ संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध माँग का आरोप हो |
| क्रम और समय | अन्य कार्यवाहियों की तुलना में शिकायत कब की गई, और क्या देरी का कारण बताया गया है |
न्यायिक फैसलों में बार-बार आने वाला विषय विशिष्टता है। जो शिकायत किसी विशेष व्यक्ति पर विशेष अवसरों पर विशेष कृत्यों का आरोप लगाती है, उसके साथ उस शिकायत से बहुत अलग व्यवहार होता है जो आठ रिश्तेदारों के नाम लेकर सामान्य रूप से उत्पीड़न का आरोप लगाती है। यह बात क्रूरता साबित करने वाली शिकायतकर्ता और आरोपमुक्ति चाहने वाले अभियुक्त, दोनों पर लागू होती है।
ऐसा मामला आमतौर पर कैसे समाप्त होता है
इसके चार सामान्य अंत होते हैं: मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकार की गई क्लोज़र रिपोर्ट; आरोप तय होने से पहले आरोपमुक्ति; वास्तविक समझौते के बाद हाईकोर्ट द्वारा कार्यवाही रद्द करना; या दोषसिद्धि या बरी होने पर समाप्त होने वाला विचारण। कई मामले तीसरे रास्ते से समाप्त होते हैं, क्योंकि अधिकांश वैवाहिक मुकदमेबाज़ी अंततः एक पैकेज के रूप में सुलझती है, जिसमें आपराधिक मामला, तलाक, भरण-पोषण और बच्चों की अभिरक्षा एक साथ शामिल होते हैं।
ज़मानत: असल स्थिति क्या है
यह अपराध गैर-ज़मानती है, और यही वह बिंदु है जिसे सबसे अधिक गलत समझा जाता है। गैर-ज़मानती का मतलब यह नहीं कि ज़मानत नहीं मिल सकती। इसका मतलब है कि ज़मानत अधिकार के तौर पर उपलब्ध नहीं है — यह तथ्यों के आधार पर अदालत के विवेक से दी जाती है।
| ज़मानती अपराध | गैर-ज़मानती अपराध | |
|---|---|---|
| ज़मानत | एक अधिकार है | अदालत के विवेक पर है |
| कौन देता है | पुलिस अधिकारी या अदालत, ज़मानत प्रस्तुत करने पर | मुख्य रूप से अदालत |
| अदालत क्या देखती है | पहचान और ज़मानतदारों के अलावा ज़्यादा कुछ नहीं | अपराध की गंभीरता, सौंपी गई भूमिका, फ़रार होने का जोखिम, साक्ष्य से छेड़छाड़, गवाहों को प्रभावित करना |
इस या किसी भी अन्य अपराध के लिए कोई तय “ज़मानत राशि” नहीं होती। अदालत मामले और व्यक्ति की परिस्थितियों के अनुसार बॉन्ड और ज़मानतदार तय करती है, और शर्तें लगाती है — हाज़िरी, गवाहों से संपर्क न करना, जहाँ प्रासंगिक हो वहाँ पासपोर्ट जमा करना। इस धारा के लिए किसी मानक राशि के रूप में बताया गया कोई भी आँकड़ा मनगढ़ंत है।
गिरफ़्तारी से पहले माँगी जाने वाली अग्रिम ज़मानत इन मामलों में आम है। अदालतें हर आवेदक का अलग-अलग आकलन करती हैं, और जिस पति पर विशिष्ट कृत्यों का आरोप है उसका परिणाम और बिना ब्योरे के नामित किसी बुज़ुर्ग रिश्तेदार का परिणाम अक्सर अलग होता है।
अदालतों द्वारा तय किए गए सुरक्षा उपाय
न्यायिक फैसलों को दो चिंताओं ने आकार दिया है: कि वास्तविक क्रूरता पर मुकदमा चले, और कि इस प्रावधान का इस्तेमाल विशिष्ट आरोपों के बिना पूरे परिवार को फँसाने के लिए न हो। अदालतों का जवाब अपराध को कमज़ोर करना नहीं, बल्कि जाँच और आरोप के चरणों पर लागू होने वाले सुरक्षा उपायों का एक समूह रहा है।
- दो महीने की कूलिंग-ऑफ़ अवधि। Shivangi Bansal v. Sahib Bansal (2025) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) के दिशानिर्देश लागू किए जाएँ: FIR के बाद दो महीने तक कोई गिरफ़्तारी या दंडात्मक कार्रवाई नहीं, और इस दौरान मामला परिवार कल्याण समिति को भेजा जाता है। इसे किस तरह लागू किया जा रहा है, यह अलग-अलग है, इसलिए अपने ज़िले की वर्तमान स्थिति जाँच लें।
- गिरफ़्तारी अपने आप नहीं होती। Arnesh Kumar में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि पुलिस कानूनी आधारों पर गिरफ़्तारी की आवश्यकता के बारे में खुद को संतुष्ट करे और कारण दर्ज करे, और मजिस्ट्रेट हिरासत की अनुमति देने से पहले अपना विवेक लगाएँ।
- हर अभियुक्त के विरुद्ध विशिष्ट आरोप ज़रूरी हैं। अदालतों ने बार-बार उन रिश्तेदारों को आरोपमुक्त किया है जिनके नाम तो लिए गए पर जिन पर कोई विशेष कृत्य नहीं लगाया गया, और विस्तारित परिवार को सामान्य रूप से घसीट लेने की प्रथा की निंदा की है।
- सुलझ चुके वैवाहिक विवादों की कार्यवाही रद्द की जा सकती है। यह माना गया है कि जहाँ वास्तविक समझौता हो गया हो, वहाँ हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्ति उपलब्ध है, भले ही अपराध अशमनीय हो।
- जहाँ शिकायत अपने आप में ही प्रक्रिया का दुरुपयोग हो, वहाँ कार्यवाही रद्द की जा सकती है — लेकिन यह एक सीमित क्षेत्राधिकार है, जिसका प्रयोग तथ्यों के परस्पर विरोधी संस्करणों पर नहीं, बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर किया जाता है।
यह भारतीय आपराधिक कानून के अधिक दूरगामी प्रभाव वाले प्रावधानों में से एक है, क्रूरता झेल रही महिला के लिए भी और शिकायत में नामित व्यक्ति के लिए भी। किसी भी विशेष मामले का परिणाम विशिष्ट तथ्यों, विशिष्ट आरोपों और विशिष्ट साक्ष्य पर निर्भर करता है। इस पृष्ठ की कोई भी बात उस वकील की सलाह का विकल्प नहीं है जिसने आपके कागज़ पढ़े हों।
साथ-साथ अक्सर लागू होने वाले प्रावधान
| दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 | दहेज देना, लेना या माँगना। जहाँ माँग का आरोप हो, वहाँ अक्सर क्रूरता वाले प्रावधान के साथ आरोप लगाया जाता है |
| घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 | स्वरूप में दीवानी, हालाँकि संरक्षण आदेश का उल्लंघन अपने आप में अपराध है। संरक्षण आदेश, निवास आदेश, आर्थिक राहत, बच्चों की अभिरक्षा और मुआवज़ा |
| धारा 80 BNS (पहले 304B IPC) | दहेज मृत्यु, जहाँ विवाह के सात साल के भीतर किसी महिला की अप्राकृतिक परिस्थितियों में मृत्यु हो और दहेज के लिए क्रूरता दिखाई गई हो |
| भरण-पोषण के प्रावधान | अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ पत्नी के लिए भरण-पोषण, जो आपराधिक मामले से अलग चलाया जाता है |
ये अलग-अलग मानकों और अलग-अलग परिणामों वाली अलग-अलग कार्यवाहियाँ हैं। इन्हें अक्सर साथ-साथ चलाया जाता है क्योंकि इनसे अलग-अलग चीज़ें मिलती हैं: आपराधिक मामला सज़ा के बारे में है, घरेलू हिंसा की कार्यवाही संरक्षण और पैसे के बारे में है, और भरण-पोषण गुज़ारे के बारे में है।
यह तय करना कि किसी वैवाहिक मामले पर कौन-से प्रावधान लागू होते हैं
NyayaMithra तथ्यों को लागू होने वाले प्रावधानों से जोड़ता है — BNS, दहेज प्रतिषेध अधिनियम और घरेलू हिंसा अधिनियम अक्सर एक-दूसरे से जुड़ते हैं — और हर प्रावधान पर प्रमुख फैसले दिखाता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या 498A का हवाला देना अब भी सही है?
भारतीय न्याय संहिता के 1 जुलाई 2024 को लागू होने से पहले किए गए अपराधों के लिए कार्यवाही धारा 498A IPC के तहत ही जारी रहती है। उस तारीख के बाद के अपराधों के लिए सही हवाला धारा 85 BNS है। व्यवहार में दोनों दिखाई देते हैं — पुराने फैसले 498A का उल्लेख करते हैं, और नज़ीर के रूप में उनका हवाला दिया जाता रहेगा, क्योंकि प्रावधान का सार ज्यों-का-त्यों आगे लाया गया है।
क्या यह अपराध ज़मानती है?
नहीं, इसे गैर-ज़मानती श्रेणी में रखा गया है, जिसका मतलब है कि ज़मानत अधिकार के तौर पर उपलब्ध नहीं है और यह अदालत के विवेक पर है। इन मामलों में अक्सर अग्रिम ज़मानत माँगी जाती है। गैर-ज़मानती का मतलब यह नहीं कि ज़मानत से इनकार कर दिया जाएगा — इसका मतलब है कि फैसला अदालत करती है।
क्या 498A का मामला वापस लिया जा सकता है?
यह अपराध अशमनीय है, इसलिए पक्षकार इसे अधिकार के तौर पर बस आपस में शमन नहीं कर सकते। जहाँ वास्तविक समझौता हो गया हो, वहाँ स्थापित रास्ता हाईकोर्ट में उसकी अंतर्निहित शक्तियों के तहत कार्यवाही रद्द करवाने की याचिका है, और अदालतों ने बार-बार माना है कि सुलझ चुके वैवाहिक विवाद इसके लिए उपयुक्त श्रेणी हैं।
पति का रिश्तेदार किसे माना जाता है?
अदालतों ने इसका अर्थ रक्त, विवाह या दत्तक-ग्रहण से संबंधित व्यक्ति माना है। विस्तारित परिवार के हर सदस्य का यांत्रिक ढंग से नाम लिख देने की बार-बार आलोचना हुई है, और जहाँ दूर के रिश्तेदारों के विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से कोई विशिष्ट आरोप नहीं था, वहाँ अदालतों ने उन्हें आरोपमुक्त किया है।
क्या FIR दर्ज होते ही गिरफ़्तारी अपने आप हो जाती है?
नहीं। सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने Arnesh Kumar में तय किया कि पुलिस को गिरफ़्तारी के प्रावधानों में दिए गए आधारों पर खुद को संतुष्ट करना होगा कि गिरफ़्तारी ज़रूरी है, और कारण दर्ज करने होंगे। पहला कदम गिरफ़्तारी नहीं, बल्कि हाज़िर होने का नोटिस है। ये निर्देश इस अपराध पर सीधे लागू होते हैं, और 2025 से सुप्रीम कोर्ट ने FIR के बाद दो महीने की एक अवधि का भी निर्देश दिया है जिसमें कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होती, जबकि परिवार कल्याण समिति मामले को देखती है।
इसमें और घरेलू हिंसा की शिकायत में क्या अंतर है?
यह एक आपराधिक अपराध है जिस पर राज्य मुकदमा चलाता है और जिसमें कैद की सज़ा है। घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत कार्यवाही स्वरूप में दीवानी है और इसमें संरक्षण और आर्थिक राहतें मिलती हैं — संरक्षण आदेश, निवास आदेश, भरण-पोषण, बच्चों की अभिरक्षा। इन्हें आमतौर पर साथ-साथ चलाया जाता है क्योंकि ये अलग-अलग काम करते हैं।
क्या क्रूरता का शारीरिक होना ज़रूरी है?
नहीं। परिभाषा में ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण शामिल है जो महिला को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने की संभावना रखता हो या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य को गंभीर चोट या खतरा पहुँचाए, और स्वास्थ्य में मानसिक स्वास्थ्य को स्पष्ट रूप से शामिल बताया गया है। संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की अवैध माँग मनवाने के लिए उत्पीड़न अलग से शामिल है।
क्या शादी के सात साल बाद शिकायत दर्ज हो सकती है?
हाँ। इस प्रावधान में सात साल की कोई सीमा नहीं है। सात साल की अवधि दहेज मृत्यु के प्रावधान — धारा 80 BNS, पहले 304B IPC — से जुड़ी है, जो विवाह के सात साल के भीतर अप्राकृतिक परिस्थितियों में महिला की मृत्यु से संबंधित है। दोनों को अक्सर एक-दूसरे से भ्रमित किया जाता है।
क्या तलाक की डिक्री के बाद शिकायत दर्ज हो सकती है?
तलाक की डिक्री अपने आप में विवाह के दौरान की गई क्रूरता की आपराधिक शिकायत को समाप्त नहीं करती, क्योंकि अपराध उसी समय पूरा हो जाता है जब वह किया जाता है। व्यवहार में, वैवाहिक कार्यवाही में हुआ समझौता आमतौर पर बाद में हाईकोर्ट में आपराधिक मामला रद्द करवाने की याचिका का आधार बनता है।
ऐसे मामले में ज़मानत राशि कितनी होती है?
इस या किसी भी अन्य अपराध के लिए कोई तय राशि नहीं है। अदालत मामले और व्यक्ति की परिस्थितियों के अनुसार बॉन्ड और ज़मानतदार तय करती है, और शर्तें लगाती है। इस धारा के लिए ऑनलाइन किसी मानक राशि के रूप में बताया गया कोई भी आँकड़ा मनगढ़ंत है।
शिकायत कहाँ दर्ज की जा सकती है?
सामान्यतः वहाँ जहाँ अपराध हुआ। क्योंकि क्रूरता अक्सर एक से अधिक स्थानों तक फैला लगातार आचरण होती है, अदालतों ने माना है कि जिस स्थान पर पत्नी ने परिणाम भुगते हैं — जिसमें उसका मायका भी शामिल है, जहाँ उसे ससुराल छोड़ने पर मजबूर किया गया हो — वहाँ की अदालत को क्षेत्राधिकार हो सकता है। इस बिंदु पर शुरुआत में ही अक्सर विवाद होता है और यह दलीलों में बताए गए तथ्यों पर निर्भर करता है।
क्या लंबित मामले वाला व्यक्ति विदेश यात्रा कर सकता है?
यह इस पर निर्भर करता है कि कोई अदालती आदेश या लुक-आउट सर्कुलर इस पर रोक लगाता है या नहीं, और दी गई किसी ज़मानत के साथ क्या शर्तें जुड़ी हैं। केवल मामला दर्ज होने से कोई सामान्य स्वचालित रोक नहीं लगती। भरोसेमंद उत्तर उस विशेष मामले के ज़मानत आदेश और अदालती रिकॉर्ड से मिलता है, किसी सामान्य नियम से नहीं।
ऐसा मामला आमतौर पर कैसे समाप्त होता है?
इसके चार सामान्य अंत होते हैं: मजिस्ट्रेट द्वारा स्वीकार की गई क्लोज़र रिपोर्ट, आरोप तय होने से पहले आरोपमुक्ति, वास्तविक समझौते के बाद हाईकोर्ट द्वारा कार्यवाही रद्द करना, या दोषसिद्धि या बरी होने पर समाप्त होने वाला विचारण। कई मामले समझौते से समाप्त होते हैं, क्योंकि वैवाहिक मुकदमेबाज़ी आमतौर पर एक पैकेज के रूप में सुलझती है, जिसमें आपराधिक मामला, तलाक, भरण-पोषण और बच्चों की अभिरक्षा एक साथ शामिल होते हैं।